What is the LED ( Light Emitting Diode ) ? How does it's works?

-: Introduction :-

आज के दौर में हम light के source के तौर पर सबसे ज्यादा उसे यूज करते है LED (Light Emitting Diode) ।  यह electrical energy को light energy जी मे कनवर्ट करता है । यह तरह-तरह की डिस्प्ले बोर्ड मे एडवरटाइजिंग बोर्ड में और इनफॉरमेशन बोर्ड्स मे  दिखता है । ट्रैफिक सिग्नल्स मे और ऑटोमोबाइल्स के हैडलाइट्स मे  भी देखते है । यह जो light radiate करता है उसका जो रेंज है ए बहुत बड़ा है । ए Infrared से लेके UV rays तक emit कर सकता है । 

-: Advantages :-

अब एक स्टैंडर्ड डायोड की सेमीकंडक्टर लेयर में अलग-अलग पदार्थ का प्रयोग होता है ।  जो  near infrared range के photons प्रोड्यूस करता है , और ऊष्मा मे बदल दिए जाते है । तो डायोड गर्म हो जाता है लेकिन एलईडी बहुत थोड़ी ऊष्मा पैदा करती है । परंपरागत incandescent लाइट्स बहुत ज्यादा ऊष्मा पैदा करती है ।


 इस डिजाइन में फिलामेंट के अंदर इलेक्ट्रॉन अनु से टकराते है , और इस टक्कर से ऊष्मा पैदा होती है । फिलामेंट इतना गर्म हो जाता है और इतना  रोशनी पैदा होती है जिसे देखा ना जा सके । LED को प्रकाश के लिए ऊष्मा पैदा करने की जरूरत नहीं होती । और इसलिए ऊर्जा के कम खपत करती है । इसे यूज करने का जो बेसिक advantage है , के इसका साइज बहुत छोटा होता है , ए बहुत strong होता है,इसका लाइफ टाइम बड़ा लंबा होता है , और ये जो एनर्जी consume करता है यह बहुत कम होता है । तो यह सारे रीजंस है जिसके कारण हम आज एलईडी को ज्यादा उसे करते हैं । 

-: Structure :-

LED और डायोड एक ही सिद्धांत पर काम करता है । यह दोनो ही फोटोन को छोड़ता है । लेकिन एलईडी द्वारा फोटोन का रेंज visible range मे  पड़ता है । ओर जो wavelength है वोह 700 से 400 नैनोमीटर तक होता है । 



LED केवल तभी प्रकाशित होती है  जब हम anode लीड को पॉजिटिव और cathode को नेगेटिव से जोड़ते है । बॉडी को epoxy resin से जोड़ दिया गया है ।   सही ध्रुवीयता की पहचान करना आसान है क्योंकि एलईडी की सबसे लंबी लीड एनोड है । लेकिन अगर एलईडी लीड्स को काटकर छोटा कर दिया गया हो तो ????  वैसे चिंता मत कीजिए क्योंकि एलईडी के एक केस का एक तरफ चपटा है और यह दर्शाता है कि यह कैथोड वाला साइड है । इसके अलावा अंदर हम देख सकते हैं की धातु की दो प्लेट है और बड़ी वाली प्लेट कैथोड है । 


        🤔 -: Working Principle :- 🤔

एलइडी का 2 terminal होता है एक पॉजिटिव और एक नेगेटिव । इस साइड को पॉजिटिव टर्मिनल के साथ जोड़ा जाता है , और इस साइट को नेगेटिव टर्मिनल से , और लाइट एमिट करता है  । यहां पर इस दो टर्मिनल के बीच में होता है एक पीएन जंक्शन । उस pn जंक्शन के थ्रू जो फॉरवर्ड बायस में करंट फ्लो होता है तो लाइट एमिट करता है ।

 तो p टाइप सेमीकंडक्टर मे एक trivalent इंप्योरिटी मिलाया जाता है । जिसके valance shell मे 3 इलेक्ट्रॉन होता है और n टाइम पर सेमीकंडक्टर मे pentavalent इंप्योरिटी ,  इसके बैलेंस सेल मे पांच इलेक्ट्रॉन होता है । पी टाइप सेमीकंडक्टर मे octet complete होने के बाद भी एक इलेक्ट्रॉन रह जाता है और इसका माइनॉरिटी चार्ज के लिए इलेक्ट्रॉनिक है । और पी टाइप सेमीकंडक्टर में ऑक्टेटे कंपलीट नहीं होता इसीलिए एक वैकेंसी रह जाता है । उसको हम होल्स कहते है । और इसका माइनॉरिटी चार्ज करियर होल्स है। जब दोनों टाइप सेमीकंडक्टर को मिलाया जाता है तब न टाइप का इलेक्ट्रॉन होल्स को न्यूट्रल करता है और मध्य बिंदु में एक लेयर बन जाता है जिसे हम depletion layer  कहते हैं । और एक छोटा सा potential barrier क्रिएट होता है । अब हमने एक बैटरी को फॉरवार्ड बॉयस में जोड़ दिया तो इलेक्ट्रॉन का बहाना चालू हो जाएगा बैटरी के नेगेटिव से टर्मिनल से लेकर पॉजिटिव टर्मिनल तक ।

तो n type सेमीकंडक्टर में जो फ्री इलेक्ट्रोंस है वह बैटरी के पोटेंशियल के कारण पी टाइप सेमीकंडक्टर पर चला जाएगा। तो अब होगा क्या चलो देखते है । 

मान लेते एक एटम है । उसके पहले ऑर्बिट में एक इलेक्ट्रॉन है । जब वह एनर्जी अब्जॉर्ब करेगा यानी कि बाहर से जब एनर्जी कोई देगा तब वह इलेक्ट्रॉन पहले ऑर्बिट से दुसरे orbit मे चला जाएगा , फिर से एनर्जी दे तो  तीसरे ऑर्बिट मे ,  ऐसी चलता ही जाएगा और एक time के बाद वो इलेक्ट्रॉन free हो जायेगा। तो आप अगर फ्री इलेक्ट्रॉन के साथ वैलैंस इलेक्ट्रोन मे तुलना तुलना करे  तो ओबवियसली फ्री इलेक्ट्रॉन का एनर्जी ज्यादा होगा । मतलब जब फ्री इलेक्ट्रॉन बैलेंस बैंड में आएगा तो कुछ एनर्जी को रिलीज करेगा इन द फॉर्म ऑफ़ फोटॉन्स । एक graph se समझते है......


मान लेते है यह जो बैलेंस बैंड है इसमें सारे बैलेंस इलेक्ट्रॉन  और कंडक्शन बंद जितने भी फ्री इलेक्ट्रोंस है इस एनर्जी लेवल पर रहेगा । जब इलेक्ट्रॉन  कंडक्शन बंद से बैलेंस बैंड में आएगा , इतना जो एनर्जी का डिफरेंस है यानी कि जो forbidden energy गैप है वही एनर्जी इन द फॉर्म ऑफ़ फोटॉन्स के रूप में बाहर निकल जाएगा । और हमें पता है जो एनर्जी रिलीज करेगा वह E= hf  (E= energy, f= frequency, h= planck constant= 6.63 × 10-³⁴ js )

के बराबर होगा ।  Forbidden energy gaph जितना ज्यादा होगा उतना एनर्जी release करेगा। h तो constant तो E जितना ज्यादा होगा f उतना ज्यादा होगा । Energy gap जितना ज्यादा उतना ज्यादा frequency का light emite करेगा मतलब blue, uv rays । और जितना कम एनर्जी गैप होगा तो कम frequency का लाइट यानाकी infrared, red । तो ऐसे led काम कार्य है । 

-: Composition :-

Example :-  उदारण तोड़  पे बाटाडू red LED मे तो उसे कैसे मे सेमीकंडक्टर के पदार्थ मे  हम Galium Arsenide Phosphide यूज करते है  । यानी की p type सेमीकंडक्टर में हम Galium यूज करते है । यह भी trivalent एलिमेंट ही है । और n type मे pentavalent impurity के तोड़ पर doping करते है Arsenic और Phosphorus । Arsenic 60% आसानी रहता है और 40% phosphorus होता है । तो यह जो forbidden एनर्जी गैप बनता है लगभग बन जाता है 1.8 eV का । जब यह एनर्जी रिलीज करेगा वोह red light के frequency के बराबर होगा।

इसके इलेवा silicon carbaide - yellow colour , Cadmium के साथ Galium phosphide - red or green colour , Galium arcenide - infrared 

-: Types of LED :-

1) Bi-directional LED :-  एक cathode और एक anode टर्मिनल होता है । इस led से 1 ही कलर निकलता  है । ए blinking करने वाली एलईडी अपने आप एक निश्चित फ्रीक्वेंसी पर जलती और बुझती है । इस प्रकार की एलईडी भी है  खुद बा खुद धीरे-धीरे या तेजी से रंग बदलती है । छोटे से कंट्रोलर से फ्रीक्वेंसी तय होती है । 


 2) 2 pin Bi- directional LED :- फिर हमारे पास है बाय डायरेक्शनल लीड्स । यह दो रंग बदल सकती है । इसके अंदर दो एलईडी विपरीत दिशाओं में कनेक्ट है । इसलिए जब करंट इस तरह प्रवाहित होता है एक एलइडी जल जाती है । और जब करंट अपोजिट पर प्रबाहित होता है तो दूसरी एलईडी जल जाती है । एक बार में केवल एक ही एलईडी जलता है ।


3) 3 pin Bi-colour LED :- इसमें एक रंग, दो रंग ,या दोनों रंगों में साथ में स्विच कर देख सकते है ।  इनके अंदर दो एलईडी है लेकिन उनके टर्मिनल एक ही है । 


4) 4 pin RGB LED :- फिर हमारे पास यह चार पी वाली आरजीबी एलइडी है।  इनके अंदर तीन अलग-अलग एलईडी है , लाल हरी और नीली । इनका टर्मिनल एक ही होता है । हम इन्हें अलग-अलग चालू कर सकते हैं  । रंग मिक्स करने के लिए एक बार में दो या सभी तीन जलाकर सफेद लाइट बना सकते है। हम प्रत्येक एलइडी में वोल्टेज और करंट नियंत्रित कर सकते है, और अपने पसंद का रंग बना सकते हैं । 


-: Symbol :-


-: Characteristics curve :-


LED ampere characteristics graph एक नॉर्मल सेमीकंडक्टर डायोड के ग्राफ का बिलकुल सिमिलर है । लेकीन फॉरवार्ड बॉयस में फोटॉन्स का emitation के कारण कुछ इलेक्ट्रोंस होल पेयर विलुप्त हो जाता है । इसीलिए करंट का मैग्नीट्यूड कुछ कम होता है । लेकिन इसका कारण एलईडी के वर्क फंक्शन में कोई फर्क नहीं पड़ता । करण फॉरवर्ड वोल्टेज कभी भी 2.5 वोल्ट या 3 वोल्ट के ऊपर नहीं तोला जाता , फारवर्ड करंट मैक्सिमम मां 50 mA सुपर नहीं जाता । फारवर्ड करंट का मैग्नीट्यूड धीरे-धीरे इंक्रीज करले,एलईडी का ब्राइटनेस बहुत बढ़ जाता है ।


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